सलातो सलाम पड़ना कैसा है 1⃣0⃣

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*🥀 सलातो सलाम पड़ना कैसा है 🥀*



*💓 पोस्ट 10*

✏️ *मैं इस सलाम से जुड़ा हुआ एक वाक़िया बयान कर रहा था कि*
            इश्क़े मिजाज़ी के एक शायर हैं दाग़ देहलवी एक दिन उनकी महफिल जमी हुई थी अचानक उनके सामने ये कलाम आ गया मुस्तफा जाने रहमत पे लाखों सलाम दाग़ देहलवी बहुत देर तक उसको हैरत से तकते रहे काफी देर के बाद मचल कर बोले कि भाई ये कलाम किसका है इत्तेफाक़ से उसी महफिल में शहज़ादये आलाहज़रत हुज़ूर हुज्जतुल इस्लाम इमाम हामिद रज़ा खान रज़ियल्लाहु तआला अन्हु भी मौजूद थे आपने फरमाया कि बरेली के एक मौलाना है उन्ही का ये कलाम है जो कि मेरे वालिदे गिरामी हैं फिर आपने उनसे पूछा कि क्या इसमें कुछ कमी नज़र आई तो दाग़ देहलवी कहते हैं कि नहीं बल्कि मौलाना होकर ऐसा कलाम लिखते हैं तअज्जुब है उनका कहने का मतलब ये था कि मौलाना होकर इश्क़ के रंग में इतनी बड़ी कह डाली मुस्तफा जाने रहमत यानि तमाम आलम की जान क्योंकि इश्क़े मिजाजी के शायर ही अपने महबूब को अक्सर जान रूह ज़िन्दगी व चांद सूरज सितारे आसमान ज़मीन हरियाली वादियां समंदर हूर परी वगैरह चीज़ों से तश्बीह दिया करते हैं ये कौन आलिम पैदा हो गए भाई कि जिसने हुज़ूर की तश्बीह 1 नहीं 1000 नहीं 1 लाख 1 करोड़ 1 अरब 1 खरब नहीं बल्कि दुनियाये जहान यहां तक कि अल्लाह के सिवा उसकी पैदा की हुई तमाम चीज़ों से कर डाली और सिर्फ तश्बीह ही नहीं की बल्कि हुज़ूर को तमाम आलम की रूह क़रार दे दिया कि जिस तरह रूह के बग़ैर जिस्म बेजान और बेकार है उसी तरह हुज़ूर के बग़ैर तमाम आलम बेजान और बेकार है मुस्तफा जाने रहमत
*वो जो न थे तो कुछ न था*
*वो जो न हों तो कुछ न हो*
*जान हैं वो जहान की*
*और जान है तो जहान है*
*अगली पोस्ट जल्द......*



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*🏁 मसलके आला हजरत 🔴*

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